BHU और ऑस्ट्रेलिया की Griffith University मिलकर बनाएंगे मानव विकास का सेंटर डेटाबेस, जनवरी 2027 से शुरू होगा शोध

BHU और ऑस्ट्रेलिया की Griffith University मिलकर बनाएंगे मानव विकास का सेंटर डेटाबेस, जनवरी 2027 से शुरू होगा शोध

वाराणसी: काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) और ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी (Griffith University) के बीच अंतरराष्ट्रीय शोध सहयोग को नई मजबूती मिली है। दोनों संस्थानों ने मानव विकास और उसकी उत्पत्ति से जुड़े रहस्यों का अध्ययन करने के लिए प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय परियोजना के तहत पार्टनर ऑर्गनाइजेशन एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस समझौते के बाद नैतिक अनुसंधान डेटा रिपॉजिटरी यानी सेंटर डेटाबेस तैयार करने की दिशा में काम आगे बढ़ेगा।

इस परियोजना का उद्देश्य मानव विकास के अध्ययन में वैज्ञानिक पूर्वाग्रहों को दूर करना, शोध के लिए बेहतर पद्धतियां विकसित करना और विभिन्न संस्थानों के बीच शोध डेटा साझा करने की व्यवस्था बनाना है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जनवरी 2027 से जीवन की उत्पत्ति से जुड़े विषयों पर शोध कार्य शुरू होने की योजना है। इस अंतरराष्ट्रीय पहल से बीएचयू के शोधकर्ताओं को वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक सहयोग और शोध निष्कर्ष प्रकाशित करने के नए अवसर मिल सकते हैं।

BHU Latest News by BHU Wale
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BHU-Griffith University Agreement: क्या है पूरा समझौता?

बीएचयू और ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के बीच यह समझौता मानव विकास से संबंधित शोध को आगे बढ़ाने के लिए किया गया है। दोनों संस्थानों के बीच अंतरराष्ट्रीय परियोजना के तहत लगभग छह महीने पहले हुए समझौते को अब वैधानिक मान्यता मिल गई है।

22 अक्टूबर को बीएचयू की ओर से कुलसचिव राजन श्रीवास्तव और ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी की ओर से रिसर्च सर्विसेज की डिप्टी डायरेक्टर लिनेट फरकुहर ने ई-हस्ताक्षर करके अनुबंध की प्रक्रिया पूरी की।

इस समझौते के तहत दोनों विश्वविद्यालयों और परियोजना में शामिल अन्य साझेदार संस्थानों के बीच शोध संबंधी सहयोग को व्यवस्थित किया जाएगा। इसके अंतर्गत डेटा साझा करने, शोध सामग्री के उपयोग और बौद्धिक संपदा से संबंधित नियमों को निर्धारित करने की दिशा में काम होगा।

मानव विकास पर शोध के लिए तैयार होगा सेंटर डेटाबेस

इस परियोजना का प्रमुख हिस्सा एक नैतिक अनुसंधान डेटा रिपॉजिटरी यानी सेंटर डेटाबेस का निर्माण है। इसमें बीएचयू सहित परियोजना से जुड़े सभी साझेदार संस्थान शोध डेटा उपलब्ध करा सकेंगे और निर्धारित नियमों के तहत उसका उपयोग कर सकेंगे।

डेटाबेस के संचालन और डेटा के इस्तेमाल से संबंधित विस्तृत नियमों के लिए अलग से डेटाबेस एग्रीमेंट तैयार किया जाएगा। इससे शोध सामग्री को व्यवस्थित तरीके से साझा करने और विभिन्न संस्थानों के शोधकर्ताओं के बीच सहयोग बढ़ाने में मदद मिलेगी।

इस पहल का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य मानव विकास के अध्ययन में अब तक मौजूद वैज्ञानिक पूर्वाग्रहों को दूर करना है। इसके लिए शोधकर्ता उपलब्ध आंकड़ों और साक्ष्यों के आधार पर नई शोध पद्धतियों को विकसित करने की दिशा में काम करेंगे।

जनवरी 2027 से शुरू होगा जीवन की उत्पत्ति पर शोध

इस अंतरराष्ट्रीय परियोजना के तहत जनवरी 2027 से जीवन की उत्पत्ति से संबंधित विषयों पर शोध शुरू करने की योजना है। परियोजना में मानव विकास और उसकी उत्पत्ति से जुड़े वैज्ञानिक प्रश्नों को समझने के लिए विभिन्न क्षेत्रों के शोधकर्ताओं के बीच सहयोग किया जाएगा।

शुरुआती चरण में बीएचयू के जंतु विज्ञान विभाग और एआईएचसी एवं पुरातत्व विभाग (AIHC & Archaeology) के शोधकर्ताओं के इस परियोजना से जुड़ने की जानकारी दी गई है। आगे चलकर शोध कार्यों के विस्तार के साथ अन्य विभागों को भी शामिल करने की योजना है।

बीएचयू के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे के अनुसार, परियोजना की शुरुआत में इन विभागों के शोधकर्ता योगदान देंगे। इसके बाद दूसरे विभागों की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में भी प्रयास किए जाएंगे।

स्वदेशी डेटा के स्वामित्व पर रहेगा मूल समुदायों का अधिकार

इस समझौते की एक महत्वपूर्ण विशेषता स्वदेशी डेटा के प्रबंधन और स्वामित्व से संबंधित प्रावधान हैं। परियोजना के दौरान एकत्र किए गए स्वदेशी डेटा के प्रबंधन और स्वामित्व का अधिकार संबंधित मूल समुदायों के पास ही सुरक्षित रहेगा।

इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शोध के लिए जुटाई गई सामग्री का उपयोग निर्धारित शर्तों और अधिकारों के अनुरूप किया जाए। डेटा साझा करने और उसके उपयोग के लिए बनाई जाने वाली व्यवस्था में संबंधित समुदायों के अधिकारों को महत्व दिया जाएगा।

मानव विकास और जीवन की उत्पत्ति जैसे विषयों पर शोध में विभिन्न प्रकार के साक्ष्यों और आंकड़ों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में डेटा के उचित प्रबंधन और जिम्मेदार उपयोग से अंतरराष्ट्रीय शोध सहयोग को व्यवस्थित बनाने में मदद मिल सकती है।

शोध सामग्री का होगा रॉयल्टी-फ्री इस्तेमाल

समझौते के अनुसार, बीएचयू और परियोजना के अन्य साझेदार संस्थान निर्धारित शर्तों के तहत बौद्धिक संपदा का उपयोग शिक्षा, शिक्षण और आगे के शोध कार्यों के लिए रॉयल्टी-मुक्त लाइसेंस के माध्यम से कर सकेंगे।

इस व्यवस्था से साझेदार संस्थानों को शोध सामग्री के शैक्षणिक उपयोग में सुविधा मिलने की उम्मीद है। शोधकर्ताओं के बीच सामग्री और निष्कर्षों का आदान-प्रदान होने से आगे के अध्ययन के लिए नए अवसर भी बन सकते हैं।

हालांकि, रॉयल्टी-मुक्त लाइसेंस का अर्थ सभी प्रकार के डेटा और सामग्री पर बिना किसी शर्त के अधिकार मिलना नहीं है। संबंधित सामग्री का उपयोग समझौते और लागू लाइसेंस की शर्तों के अनुसार ही किया जाएगा।

परियोजना को मिला 85 मिलियन डॉलर का अनुदान

इस अंतरराष्ट्रीय शोध पहल का नेतृत्व ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के प्रो. माइकल पेट्राग्लिया कर रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस केंद्र को ऑस्ट्रेलियन रिसर्च काउंसिल (ARC) की ओर से सात वर्षों के लिए 85 मिलियन डॉलर का अनुदान मिला है।

परियोजना में कई प्रतिष्ठित ऑस्ट्रेलियाई संस्थान भी भागीदार हैं। इनमें द ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी, मोनाश यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड और यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं।

अनेक विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों की भागीदारी से इस परियोजना को बहुविषयक स्वरूप मिलने की संभावना है। विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ एक साथ मिलकर मानव विकास और उसकी उत्पत्ति से जुड़े शोध प्रश्नों पर काम कर सकेंगे।

BHU के शोधकर्ताओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह परियोजना?

बीएचयू और ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के बीच यह समझौता विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय शोध सहयोग को बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे बीएचयू के शोधकर्ताओं को अंतरराष्ट्रीय परियोजना के अंतर्गत अन्य संस्थानों के साथ काम करने का अवसर मिल सकता है।

इस परियोजना के संभावित लाभों में शामिल हैं:

  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: विदेशी विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के साथ मिलकर काम करने के अवसर।
  • डेटा साझा करने की सुविधा: शोध संबंधी आंकड़ों और सामग्री के व्यवस्थित आदान-प्रदान की व्यवस्था।
  • बहुविषयक शोध: जंतु विज्ञान, पुरातत्व और अन्य संबंधित विषयों के शोधकर्ताओं की भागीदारी।
  • नई शोध पद्धतियां: मानव विकास से जुड़े प्रश्नों के अध्ययन के लिए बेहतर और अधिक समावेशी वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयास।
  • शैक्षणिक उपयोग: निर्धारित शर्तों के तहत शोध सामग्री का शिक्षा, शिक्षण और आगे के अनुसंधान में रॉयल्टी-मुक्त इस्तेमाल।

परियोजना के आगे बढ़ने के साथ शोध में शामिल विभागों और शोधकर्ताओं की संख्या बढ़ने की संभावना है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित होंगे शोध निष्कर्ष

परियोजना से जुड़े शोधकर्ताओं का लक्ष्य मानव विकास और जीवन की उत्पत्ति से संबंधित विषयों पर वैज्ञानिक अध्ययन को आगे बढ़ाना है। बीएचयू के शोधकर्ता इस प्रक्रिया में भागीदारी करते हुए अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से शोध कार्यों को विकसित कर सकेंगे।

शोध निष्कर्षों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित करने की दिशा में भी काम किया जाएगा। इससे संबंधित विषयों पर वैज्ञानिक विमर्श को आगे बढ़ाने और विभिन्न संस्थानों के बीच ज्ञान साझा करने में सहायता मिल सकती है।

फिलहाल, परियोजना के शुरुआती चरण में जंतु विज्ञान विभाग और एआईएचसी एवं पुरातत्व विभाग के शोधकर्ताओं की भागीदारी प्रस्तावित है। आगे की प्रगति के साथ अन्य विभागों को जोड़ने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ेगी।

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निष्कर्ष

बीएचयू और ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के बीच हुआ समझौता मानव विकास और जीवन की उत्पत्ति से संबंधित अंतरराष्ट्रीय शोध को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। सेंटर डेटाबेस का निर्माण, शोध सामग्री के रॉयल्टी-मुक्त उपयोग की व्यवस्था और स्वदेशी डेटा के अधिकारों की सुरक्षा इस परियोजना के प्रमुख पहलू हैं।

जनवरी 2027 से प्रस्तावित शोध कार्यों के शुरू होने के साथ बीएचयू के शोधकर्ताओं को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग में भाग लेने का अवसर मिलेगा। परियोजना की प्रगति और इसमें अन्य विभागों की भागीदारी से संबंधित अधिक जानकारी आगे सामने आने की उम्मीद है।

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